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उत्तराखंड की पहाड़ी थाली से निकलेगा पोषण का नया सूत्र, पारंपरिक अनाजों पर राष्ट्रीय पोषण संस्थान कर रहा बड़ा शोध

मंडुवा, झंगोरा समेत पारंपरिक अनाजों के पोषण मूल्य और स्वास्थ्य प्रभावों की होगी वैज्ञानिक जांच; कुपोषण, पोषक तत्वों की कमी और बढ़ते मोटापे से निपटने में मिलेगी मदद

देहरादून। उत्तराखंड की पहाड़ी थाली में सदियों से शामिल रहे पारंपरिक अनाज अब वैज्ञानिक कसौटी पर परखे जा रहे हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के राष्ट्रीय पोषण संस्थान (NIN) की ओर से उत्तराखंड के पारंपरिक अनाजों के पोषण मूल्य और स्वास्थ्य पर उनके प्रभाव को लेकर शोध किया जा रहा है। इस अध्ययन का उद्देश्य यह समझना है कि इन पारंपरिक खाद्य पदार्थों को आधुनिक पोषण व्यवस्था में किस तरह बेहतर तरीके से शामिल किया जा सकता है।

यह शोध ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब देश के सामने पोषण से जुड़ी दोहरी चुनौती है। एक ओर आज भी कुपोषण और जरूरी पोषक तत्वों की कमी चिंता का विषय है, वहीं दूसरी ओर मोटापा और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में स्थानीय और पारंपरिक खाद्य पदार्थों के पोषण संबंधी गुणों को वैज्ञानिक तरीके से समझना काफी महत्वपूर्ण हो जाता है।

खाद्य सुरक्षा के बाद अब पोषण सुरक्षा पर जोर

पीआइबी देहरादून के हैदराबाद भ्रमण कार्यक्रम के तहत उत्तराखंड के मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को राष्ट्रीय पोषण संस्थान का भ्रमण किया। इस दौरान संस्थान की शोध गतिविधियों और प्रयोगशालाओं की कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी दी गई।

संस्थान में 57 विज्ञानियों की बहुविषयक टीम पोषण से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर शोध कर रही है। इस टीम में चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ-साथ सामाजिक विज्ञान से जुड़े विज्ञानी भी शामिल हैं।

विज्ञानियों के अनुसार, देश ने खाद्य सुरक्षा की दिशा में काफी प्रगति की है, लेकिन अब अगली बड़ी चुनौती पोषण सुरक्षा की है। यानी केवल लोगों तक भोजन पहुंचना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि उनके भोजन में शरीर की जरूरत के मुताबिक पर्याप्त मात्रा में आवश्यक पोषक तत्व मौजूद हों।

पहाड़ी अनाजों में छिपे पोषण को समझने की कोशिश

उत्तराखंड के पारंपरिक अनाजों पर किया जा रहा अध्ययन इसी सोच का हिस्सा है। पहाड़ों की पारंपरिक थाली में लंबे समय से इस्तेमाल होने वाले स्थानीय अनाजों और खाद्य पदार्थों के पोषण मूल्य का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है।

इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि इन खाद्य पदार्थों में मौजूद पोषक तत्व शरीर के लिए कितने उपयोगी हैं और इन्हें कुपोषण तथा पोषक तत्वों की कमी से निपटने वाली रणनीतियों में किस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने संस्थान की विभिन्न प्रयोगशालाओं का भी भ्रमण किया। इस दौरान खाद्य पदार्थों की जांच, पोषक तत्वों के विश्लेषण और पोषण से जुड़े वैज्ञानिक शोध की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।

बचपन से विकसित करनी होगी स्वस्थ खानपान की आदत

एनआइएन की निदेशक डा. भारती कुलकर्णी ने स्वस्थ खानपान की आदतों को बचपन से विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों के शुरुआती वर्षों में भोजन को लेकर विशेष सावधानी बरतना जरूरी है।

उन्होंने बताया कि दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के भोजन में अलग से चीनी नहीं दी जानी चाहिए। उनका कहना है कि केवल पेट भरना या भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं है। शरीर की जरूरत के अनुसार अलग-अलग खाद्य पदार्थों का उचित मात्रा में सेवन करना भी उतना ही जरूरी है।

खानपान को लेकर भ्रांतियां दूर करना जरूरी

पोषण सूचना, संचार एवं स्वास्थ्य शिक्षा विभाग के प्रमुख डा. सुब्बा राव एम. गावरवरापु ने कहा कि देश में कुपोषण, पोषक तत्वों की कमी और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां एक साथ चुनौती बनी हुई हैं।

उन्होंने कहा कि खानपान को लेकर समाज में कई तरह की भ्रांतियां भी मौजूद हैं। ऐसे में वैज्ञानिक शोध से प्राप्त जानकारी को सरल और समझने योग्य भाषा में आमजन तक पहुंचाना बेहद जरूरी है, ताकि लोग अपने भोजन को लेकर सही निर्णय ले सकें।

पहाड़ी थाली को मिल सकता है वैज्ञानिक आधार

उत्तराखंड के पारंपरिक अनाजों पर हो रहा यह शोध राज्य की पारंपरिक खाद्य संस्कृति को वैज्ञानिक आधार देने की दिशा में भी अहम कदम माना जा रहा है। यदि शोध में इन अनाजों के स्वास्थ्य लाभ और पोषण संबंधी उपयोगिता स्पष्ट रूप से सामने आती है, तो इन्हें आधुनिक आहार और पोषण कार्यक्रमों में अधिक प्रभावी तरीके से शामिल करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

सालारजंग संग्रहालय में दिखी देश की सांस्कृतिक समृद्धि

हैदराबाद भ्रमण के दौरान उत्तराखंड के मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने सालारजंग संग्रहालय का भी दौरा किया। यहां मौजूद ऐतिहासिक वस्तुओं, दुर्लभ संग्रहों और विभिन्न कलाकृतियों के माध्यम से प्रतिनिधियों ने हैदराबाद के साथ-साथ देश की कला, संस्कृति और समृद्ध विरासत को करीब से जाना।

कुल मिलाकर, उत्तराखंड की पारंपरिक पहाड़ी थाली अब केवल संस्कृति और स्वाद का हिस्सा नहीं, बल्कि आधुनिक पोषण विज्ञान के लिए भी अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय बन रही है।

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