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GSI की चौंकाने वाली रिपोर्ट: लैंडस्लाइड के हाई रिस्क में उत्तराखंड का 22% हिस्सा, बारिश के साथ बढ़ी चिंता

भूस्खलन के लिहाज से उत्तराखंड के बड़े भूभाग पर मंडरा रहा खतरा, पर्वतीय जिलों में लगातार सामने आ रही लैंडस्लाइड की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता

देहरादून। उत्तराखंड में लगातार हो रही बारिश के बीच भूस्खलन का खतरा एक बार फिर गंभीर चिंता का विषय बन गया है। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) की रिपोर्ट में राज्य के करीब 22 प्रतिशत हिस्से को लैंडस्लाइड के हाई रिस्क जोन में बताया गया है। रिपोर्ट सामने आने के बाद मानसून के दौरान पर्वतीय क्षेत्रों में सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है।

उत्तराखंड भौगोलिक रूप से बेहद संवेदनशील पर्वतीय राज्य है। यहां ऊंची और खड़ी पहाड़ियों के साथ कई क्षेत्रों में कमजोर भूगर्भीय संरचना पाई जाती है। ऐसे में लगातार बारिश होने पर पहाड़ी ढलानों के खिसकने और सड़क मार्गों पर मलबा आने का खतरा बढ़ जाता है।

⚠️ 22 प्रतिशत क्षेत्र हाई रिस्क जोन में

GSI की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड का करीब 22 प्रतिशत भूभाग भूस्खलन के हाई रिस्क क्षेत्र में आता है। इसका मतलब है कि राज्य के इन हिस्सों में भूस्खलन की संभावना अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक बनी रहती है।

मानसून के दौरान जब पहाड़ों में लगातार कई घंटों तक बारिश होती है तो जमीन में पानी का दबाव बढ़ता है। इससे कमजोर ढलानों के खिसकने की आशंका बढ़ जाती है। कई बार अचानक भारी मलबा और चट्टानें सड़क पर गिरने से यातायात बाधित हो जाता है और जान-माल के नुकसान का खतरा पैदा हो जाता है।

🌧️ भारी बारिश के बीच लगातार सामने आ रही लैंडस्लाइड

उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में मानसून के दौरान भूस्खलन की घटनाएं आम हो जाती हैं। बारिश के बाद कई जगह पहाड़ियों से मलबा सड़कों पर आ जाता है, जिससे चारधाम यात्रा और स्थानीय यातायात प्रभावित होता है।

ऋषिकेश-नीलकंठ, ऋषिकेश-बदरीनाथ, ऋषिकेश-गंगोत्री समेत कई पर्वतीय मार्गों पर बारिश के दौरान सड़क पर मलबा आने का खतरा बना रहता है। कई बार मार्ग खोलने के लिए प्रशासन और लोक निर्माण विभाग की टीमों को घंटों तक राहत एवं बचाव कार्य करना पड़ता है।

🏔️ पहाड़ी ढलानों पर बढ़ता दबाव बड़ी चुनौती

विशेषज्ञों के अनुसार, प्राकृतिक कारणों के अलावा पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ता निर्माण कार्य, सड़क चौड़ीकरण और ढलानों की कटिंग भी कई स्थानों पर भूस्खलन के खतरे को प्रभावित कर सकती है।

जब पहाड़ी ढलानों की प्राकृतिक संरचना में बदलाव होता है और बारिश का पानी तेजी से जमीन के भीतर पहुंचता है, तो कमजोर हिस्सों के खिसकने की आशंका बढ़ सकती है। ऐसे में संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर समय रहते सुरक्षा उपाय करना बेहद जरूरी है।

🚧 सड़कें होती हैं सबसे ज्यादा प्रभावित

भूस्खलन का सबसे तत्काल असर पर्वतीय सड़कों पर दिखाई देता है। पहाड़ी से मलबा और बड़े पत्थर सड़क पर गिरने से यातायात बाधित हो जाता है। कई बार सड़क का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त होने से संपर्क मार्ग भी कट जाते हैं।

ऐसी स्थिति में स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों, श्रद्धालुओं और रोजाना आवाजाही करने वाले यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

🚨 संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने की जरूरत

GSI की रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब राज्य में बारिश का दौर जारी है। ऐसे में हाई रिस्क वाले क्षेत्रों में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती समय रहते भूस्खलन की आशंका वाले स्थानों की पहचान करना और वहां निगरानी बढ़ाना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील ढलानों पर लगातार निगरानी, ड्रेनेज व्यवस्था को मजबूत करना, सड़क कटिंग के दौरान वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल और स्थानीय स्तर पर शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना नुकसान को कम करने में मदद कर सकता है।

📍 लोगों को भी बरतनी होगी सावधानी

बारिश के दौरान पर्वतीय मार्गों पर यात्रा करने वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। पहाड़ी से पत्थर गिरने, सड़क पर मलबा आने या पानी के तेज बहाव की स्थिति में जोखिम लेकर आगे बढ़ना खतरनाक साबित हो सकता है।

प्रशासन की ओर से भी लोगों से अपील की जाती है कि भारी बारिश के दौरान अनावश्यक यात्रा से बचें और मौसम तथा सड़क की स्थिति की जानकारी लेने के बाद ही पर्वतीय क्षेत्रों की ओर रवाना हों।

GSI की रिपोर्ट ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि उत्तराखंड में भूस्खलन का खतरा केवल मानसून के दौरान होने वाली छिटपुट घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य के बड़े हिस्से में यह एक गंभीर प्राकृतिक जोखिम बना हुआ है।

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