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उत्तराखंड में टीबी का अलार्म: 3947 हाई-रिस्क गांवों में मंडरा रहा खतरा, 10 लाख लोग अभी भी जांच से दूर

देहरादून। उत्तराखंड में टीबी (तपेदिक) के खिलाफ चल रही लड़ाई अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रही है। प्रदेश के हजारों गांवों में संक्रमण का खतरा बढ़ता जा रहा है, जबकि बड़ी आबादी अभी भी स्वास्थ्य विभाग की स्क्रीनिंग से बाहर है। यही वजह है कि राज्य सरकार ने टीबी नियंत्रण अभियान में सुस्ती पर सख्त रुख अपनाया है।

प्रदेश में कुल 4216 गांवों को टीबी संक्रमण के लिहाज से संवेदनशील माना गया है। इनमें से 3947 गांव हाई-रिस्क श्रेणी में रखे गए हैं, लेकिन अब तक केवल 2493 गांवों में ही स्क्रीनिंग अभियान पूरा हो पाया है। इसका मतलब है कि करीब 37 प्रतिशत गांव अभी भी जांच प्रक्रिया से बाहर हैं, जिससे बीमारी के प्रसार का खतरा बना हुआ है।

हर साल बढ़ रहे मरीज, चुनौती बनी टीबी

स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में हर वर्ष लगभग 28 हजार नए टीबी मरीज सामने आते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर पहचान और उपचार नहीं होने पर संक्रमण का दायरा और बढ़ सकता है।

मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया है कि टीबी उन्मूलन अभियान में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जिन जिलों में स्क्रीनिंग की रफ्तार बेहद धीमी है, वहां के अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए गए हैं।

इन जिलों में सबसे ज्यादा चिंता

टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, पौड़ी, देहरादून, नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और हरिद्वार ऐसे जिले हैं जहां स्क्रीनिंग का प्रतिशत 60 फीसदी से भी कम है। यही जिले टीबी से होने वाली मौतों के मामलों में भी संवेदनशील माने जा रहे हैं।

लक्ष्य बड़ा, प्रगति धीमी

केंद्र सरकार ने उत्तराखंड में 14 लाख ग्रामीणों की स्क्रीनिंग का लक्ष्य तय किया है। हालांकि अब तक केवल 5 लाख लोगों की जांच हो सकी है। यानी 10 लाख से अधिक लोग अभी भी स्क्रीनिंग का इंतजार कर रहे हैं।

संसाधनों की कमी नहीं, फिर भी चुनौती बरकरार

राज्य में टीबी नियंत्रण के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य ढांचा मौजूद है। वर्तमान में प्रदेश में:

  • 13 जिला टीबी केंद्र
  • 98 ब्लॉक स्तरीय टीबी यूनिट
  • 157 सक्रिय जांच केंद्र
  • 131 आधुनिक जांच मशीनें
  • 33 पोर्टेबल एक्स-रे मशीनें
  • 19 नई मशीनें जल्द मिलने वाली हैं

इसके बावजूद स्क्रीनिंग अभियान की धीमी रफ्तार सरकार और स्वास्थ्य विभाग दोनों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

खतरे की घंटी साफ सुनाई दे रही है

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हाई-रिस्क गांवों में जल्द व्यापक स्क्रीनिंग नहीं हुई, तो टीबी उन्मूलन का लक्ष्य प्रभावित हो सकता है। ऐसे में आने वाले महीनों में स्वास्थ्य विभाग के लिए सबसे बड़ी चुनौती उन लाखों लोगों तक पहुंचना होगी जो अभी भी जांच के दायरे से बाहर हैं।

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