रुड़की नगर निगम के दो अफसरों पर 20 हजार का जुर्माना, RTI में छह माह की देरी और अधूरी सूचना पर कार्रवाई

रुड़की नगर निगम के दो अफसरों पर 20 हजार का जुर्माना, RTI में छह माह की देरी और अधूरी सूचना पर कार्रवाई
रुड़की। सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत मांगी गई जानकारी समय पर उपलब्ध न कराना और बाद में अधूरी सूचना देना नगर निगम रुड़की के दो अधिकारियों को भारी पड़ गया। उत्तराखंड सूचना आयोग ने दोनों अधिकारियों पर कुल 20 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है।
मामला दिल्ली निवासी विराट अग्रवाल की ओर से नगर निगम रुड़की में दाखिल की गई RTI से जुड़ा है। अग्रवाल ने नगर निगम से होर्डिंग और विज्ञापन से संबंधित नियमावली तथा वर्ष 2010 से 2025 के बीच लगाए गए होर्डिंग विज्ञापनों से जुड़ी जानकारी मांगी थी।
छह महीने तक लंबित रही RTI
आयोग के आदेश के अनुसार, RTI आवेदन संबंधित अधिकारियों तक पहुंचने के बावजूद निर्धारित समय सीमा के भीतर आवेदक को जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। जानकारी करीब छह महीने तक लंबित रही। इसके बाद जो सूचना दी गई, वह भी पूरी नहीं थी।
मामले को लेकर आवेदक ने सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान आयोग ने सूचना उपलब्ध कराने में हुई देरी और सूचना की अपूर्णता को गंभीरता से लिया।
इन दो अधिकारियों पर हुई कार्रवाई
राज्य सूचना आयुक्त दिलीप सिंह कुंवर के आदेश के तहत कार्रवाई की गई। इसमें:
- अमरजीत कौर — लोक सूचना अधिकारी एवं सहायक नगर आयुक्त
- एसपी गुप्ता — डीम्ड लोक सूचना अधिकारी एवं कर निर्धारण एवं राजस्व अधिकारी
पर कुल 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया।
होर्डिंग विज्ञापनों की जानकारी थी RTI का विषय
RTI आवेदन में मुख्य रूप से नगर निगम क्षेत्र में होर्डिंग विज्ञापनों से संबंधित नियम, अनुमति प्रक्रिया और वर्ष 2010 से 2025 तक लगाए गए होर्डिंग विज्ञापनों से जुड़ी जानकारी मांगी गई थी।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि RTI अधिनियम के तहत लोक सूचना अधिकारी को निर्धारित समय सीमा में सूचना उपलब्ध करानी होती है। सूचना देने में अनावश्यक देरी या अपूर्ण सूचना दिए जाने पर आयोग संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है।
सूचना आयोग ने दिया स्पष्ट संदेश
इस मामले में जुर्माना लगाए जाने को सरकारी कार्यालयों में RTI आवेदनों के समयबद्ध निस्तारण को लेकर महत्वपूर्ण कार्रवाई माना जा रहा है। आयोग की कार्रवाई से यह संदेश जाता है कि RTI आवेदनों को लंबित रखना या अधूरी जानकारी देकर मामले को टालना अधिकारियों के लिए भारी पड़ सकता है
