
Rajaji National Park से निकलकर जंगली हाथियों का एक बड़ा दल ऋषिकेश क्षेत्र के खदरी खड़क माफ गांव पहुंच गया है। हाथियों की लगातार बढ़ती आवाजाही से ग्रामीणों और किसानों में भय का माहौल बन गया है। खासतौर पर धान की बुआई के इस महत्वपूर्ण समय में किसानों को अपनी फसलों और खेतों के भारी नुकसान की आशंका सता रही है।
ग्रामीणों के अनुसार, इलाके में पहले से ही एक दंतैल जंगली हाथी मौजूद है, जिसने पिछले कई महीनों से किसानों की परेशानी बढ़ा रखी है। अब बड़े झुंड के आने से हालात और गंभीर हो गए हैं। किसानों का कहना है कि यदि हाथियों का दल खेतों की ओर बढ़ा तो धान की पौध और फसल पूरी तरह तबाह हो सकती है, जिससे खेत रोपाई से पहले ही बंजर होने की स्थिति में पहुंच जाएंगे।
आम के बागानों को भी भारी नुकसान
स्थानीय किसान भगवान सिंह नेगी ने बताया कि उनके एक एकड़ में फैले आम के बगीचे को हर साल जंगली हाथी नुकसान पहुंचा रहे हैं। लगातार पेड़ों के टूटने और उजड़ने से उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है। किसानों की सबसे बड़ी नाराजगी इस बात को लेकर है कि बागवानी को वन विभाग द्वारा मुआवजा श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है, जिसके कारण उन्हें किसी प्रकार की राहत राशि नहीं मिल पाती।
खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे किसान
कृषि विशेषज्ञ एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ. विनोद प्रसाद जुगलान का कहना है कि हिमालय से निकलने के बाद गंगा का पहला उपजाऊ खादर क्षेत्र खदरी वर्षों से अपनी उर्वर भूमि के लिए प्रसिद्ध रहा है। लेकिन सौंग नदी के भू-कटाव, वन्यजीवों के लगातार हमलों और फसल नुकसान ने किसानों को खेती से विमुख कर दिया है।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि क्षेत्र के लगभग एक तिहाई किसान कृषि कार्य छोड़ चुके हैं। इसका फायदा अब भूमाफिया उठा रहे हैं और इलाके में अवैध प्लॉटिंग का कारोबार तेजी से फैल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही हाल रहा तो आने वाले समय में खदरी गांव की पहचान और भूगोल दोनों बदल जाएंगे।
ग्रामीणों की बड़ी मांग
गांववासियों ने प्रशासन और वन विभाग से मांग की है कि राजकीय पॉलीटेक्निक संस्थान के पीछे गांव की सीमा से लगे करीब 15 हेक्टेयर प्लांटेशन क्षेत्र के पास हाथी खाई (Elephant Trench) का निर्माण कराया जाए, ताकि जंगली हाथियों और अन्य वन्यजीवों की गांव व खेतों में एंट्री रोकी जा सके।
ग्रामीणों का कहना है कि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो किसानों की आजीविका, खेती और गांव की पारंपरिक पहचान पर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।