मिडिल ईस्ट तनाव ले डूबा भारतीय बासमती चावल का कारोबार! निर्यात घटने से मंडियों की खरीद में कमी, किसानों पर सीधा असर

पश्चिम एशिया यानी मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष का असर अब भारत के बासमती चावल कारोबार पर दिखाई देने लगा है। शिपिंग रूट में बाधा, माल ढुलाई और बीमा लागत में बढ़ोतरी तथा विदेशी खरीदारों की अनिश्चितता के कारण पंजाब के निर्यातकों और मिलर्स ने मंडियों से बासमती की खरीद कम करने की तैयारी शुरू कर दी है। इसका असर ऐसे समय में सामने आया है जब पंजाब की मंडियों में नई बासमती फसल की आवक शुरू हो रही है।
हर महीने करीब 5 लाख टन बासमती का निर्यात
बासमती एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन पंजाब के अध्यक्ष बल कृष्ण गर्ग के मुताबिक, भारत हर महीने लगभग 5 लाख टन बासमती चावल का निर्यात करता है, जिसमें पंजाब की हिस्सेदारी करीब एक-तिहाई है। पश्चिम एशिया में फरवरी में संघर्ष शुरू होने से पहले पंजाब के निर्यातक लगभग 1.6 लाख टन बासमती हर महीने निर्यात कर रहे थे। अब शिपमेंट और बाजार की अनिश्चितता के कारण इसमें कमी आई है।
दुबई भेजने का खर्च 500 से बढ़कर 5,000 डॉलर
सबसे बड़ी समस्या माल ढुलाई की लागत को लेकर है। रिपोर्ट के अनुसार, पहले दुबई तक एक कंटेनर भेजने में करीब 500 डॉलर खर्च आता था, लेकिन तनाव के बाद यह लागत बढ़कर 5,000 डॉलर से अधिक हो गई है। शिपिंग कंपनियों द्वारा रूट बदलने और सेवाएं सीमित करने से निर्यातकों की लागत और डिलीवरी का जोखिम दोनों बढ़े हैं।
सऊदी अरब की खेप का रूट भी बदला
सऊदी अरब भारतीय बासमती के बड़े खरीदारों में शामिल है। रिपोर्ट के मुताबिक, पहले कुछ खेप दम्माम पोर्ट के रास्ते जाती थीं, लेकिन क्षेत्रीय तनाव के कारण अब कुछ शिपमेंट को जेद्दा पोर्ट की ओर मोड़ा जा रहा है। इससे परिवहन लागत और डिलीवरी का समय प्रभावित हो रहा है।
मंडियों में नई फसल, लेकिन खरीद पर दबाव
पंजाब की मंडियों में बासमती की नई फसल पहुंचना शुरू हो गई है। दूसरी तरफ निर्यातकों और मिलर्स को पुराने स्टॉक की बिक्री और भंडारण की चिंता है। यदि निर्यात लंबे समय तक कमजोर रहता है तो मिलर्स के पास नई फसल रखने की जगह सीमित हो सकती है और वे किसानों से खरीद कम कर सकते हैं।
इसका सीधा असर किसानों की बिक्री और कीमतों पर पड़ सकता है। खासकर पंजाब और हरियाणा के बासमती उत्पादकों के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि बासमती उत्पादन का बड़ा हिस्सा निर्यात बाजार पर निर्भर रहता है।
APEDA के आंकड़ों से भी निर्यात जोखिम का संकेत
APEDA के एक मार्केट इंटेलिजेंस डैशबोर्ड के अनुसार, 2021-25 के औसत में भारत के बासमती निर्यात का करीब 77% हिस्सा मध्य-पूर्व के बाजारों से जुड़ा रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि संघर्ष के दौरान लगभग 4-5 लाख टन बासमती शिपमेंट बंदरगाहों, गंतव्य बंदरगाहों या समुद्र में फंसने का अनुमान लगाया गया था।
हालांकि कुल चावल निर्यात की तस्वीर अलग है
यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए। कुल भारतीय चावल निर्यात में अभी हर अवधि में गिरावट नहीं दिख रही है। सितंबर 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल-अगस्त 2026-27 में भारत के चावल निर्यात का मूल्य करीब $4.81 अरब रहा, जो साल-दर-साल 2.17% अधिक था। इसलिए मौजूदा दबाव खास तौर पर बासमती और पश्चिम एशिया से जुड़े व्यापार तथा लॉजिस्टिक्स पर ज्यादा दिखाई दे रहा है।
किसानों के सामने क्या चुनौती?
अगर पश्चिम एशिया में तनाव लंबा चलता है तो तीन प्रमुख समस्याएं सामने आ सकती हैं:
- मंडियों में बासमती की खरीद धीमी होना
- मिलर्स के पास स्टोरेज की समस्या बढ़ना
- निर्यात मांग कमजोर होने पर किसानों को कीमतों पर दबाव झेलना
वहीं यदि शिपिंग रूट सामान्य होते हैं और विदेशी मांग वापस आती है, तो निर्यात और मंडी खरीद में सुधार की संभावना बन सकती है। फिलहाल व्यापारियों की सबसे बड़ी चिंता संघर्ष की अवधि और शिपिंग लागत को लेकर है।मिडिल ईस्ट संकट ने भारतीय बासमती कारोबार की सप्लाई चेन और निर्यात लागत को प्रभावित किया है। पंजाब में नई फसल की आवक के बीच निर्यातकों द्वारा खरीद घटाने की खबर किसानों के लिए चिंता बढ़ा रही है, हालांकि इसे पूरे भारतीय चावल निर्यात में समान गिरावट के रूप में देखना सही नहीं होगा।
