109 साल पहले सिनेमा में हुआ था ‘लंका दहन’, पहली बार पर्दे पर दिखी थी ‘अधर्म पर धर्म’ की विजयगाथा

भारतीय सिनेमा के इतिहास में ‘लंका दहन’ फिल्म का खास स्थान है। वर्ष 1917 में रिलीज हुई इस मूक फिल्म ने रामायण की पौराणिक कथा को पर्दे पर जीवंत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। दादा साहेब फाल्के के निर्देशन में बनी इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाई।
नई दिल्ली। आज भारतीय सिनेमा तकनीक, भव्य सेट, शानदार विजुअल इफेक्ट्स और आधुनिक कैमरों के दम पर दुनिया भर में अपनी पहचान बना चुका है। लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब फिल्मों में न आवाज होती थी और न ही आज जैसी आधुनिक तकनीक। उस दौर में भी भारतीय फिल्मकार अपनी कल्पनाशक्ति और सीमित संसाधनों के सहारे ऐसी कहानियां पर्दे पर उतार रहे थे, जो दर्शकों के दिलों में गहरी छाप छोड़ देती थीं। ऐसी ही ऐतिहासिक फिल्मों में से एक थी ‘लंका दहन’, जिसने वर्ष 1917 में भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ा।
दादा साहेब फाल्के ने पर्दे पर उतारी रामायण की कथा
‘लंका दहन’ का निर्देशन भारतीय सिनेमा के जनक कहे जाने वाले दादा साहेब फाल्के ने किया था। यह मूक फिल्म रामायण के उस प्रसिद्ध प्रसंग पर आधारित थी, जिसमें भगवान हनुमान माता सीता की खोज में लंका पहुंचते हैं और रावण की सोने की नगरी में आग लगा देते हैं। फिल्म में धार्मिक आस्था, साहस और बुराई पर अच्छाई की जीत के संदेश को चित्रों और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया गया था।
उस समय फिल्मों में संवाद सुनाने के लिए आवाज की तकनीक उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में कलाकारों के हाव-भाव, शारीरिक अभिनय और दृश्यों के माध्यम से कहानी दर्शकों तक पहुंचाई जाती थी। ‘लंका दहन’ ने दिखाया कि सीमित तकनीकी साधनों के बावजूद पौराणिक कथाओं को प्रभावशाली तरीके से बड़े पर्दे पर प्रस्तुत किया जा सकता है।
दर्शकों के बीच फिल्म ने बनाई खास पहचान
‘लंका दहन’ को भारतीय मूक सिनेमा की महत्वपूर्ण और व्यावसायिक रूप से सफल फिल्मों में गिना जाता है। फिल्म की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण रामायण की कहानी से लोगों का भावनात्मक और धार्मिक जुड़ाव था। भगवान राम, माता सीता, हनुमान और रावण से जुड़ी कथा पहले से ही भारतीय समाज में लोकप्रिय थी। जब दर्शकों ने इस कहानी को पर्दे पर देखा, तो सिनेमा उनके लिए मनोरंजन के साथ-साथ धार्मिक कथाओं को देखने का नया माध्यम भी बन गया।
फिल्म से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि अभिनेता अन्ना सालुंके ने इसमें भगवान राम और माता सीता, दोनों की भूमिकाएं निभाई थीं। उस समय महिला कलाकारों का फिल्मों में काम करना आम नहीं था, इसलिए पुरुष कलाकारों द्वारा महिला पात्रों का अभिनय करना असामान्य बात नहीं थी।
सीमित तकनीक में तैयार हुई थी ऐतिहासिक फिल्म
आज फिल्मों में आग, युद्ध और काल्पनिक दुनिया दिखाने के लिए कंप्यूटर ग्राफिक्स और अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल होता है। लेकिन 1917 के दौर में फिल्मकारों को ऐसे दृश्य तैयार करने के लिए व्यावहारिक तरीकों और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता था। ‘लंका दहन’ जैसी फिल्मों का निर्माण उस समय के फिल्मकारों की रचनात्मकता, मेहनत और प्रयोग करने की क्षमता का उदाहरण था।
दादा साहेब फाल्के इससे पहले भी भारतीय पौराणिक कथाओं को फिल्मों के माध्यम से प्रस्तुत कर चुके थे। उनकी वर्ष 1913 में रिलीज हुई फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ को भारत की पहली पूर्ण लंबाई वाली फीचर फिल्म माना जाता है। इसके बाद उन्होंने पौराणिक विषयों को केंद्र में रखकर भारतीय सिनेमा को एक अलग पहचान दिलाने का प्रयास जारी रखा।
भारतीय सिनेमा के विकास में रहा अहम योगदान
‘लंका दहन’ केवल रामायण की एक कहानी को पर्दे पर दिखाने वाली फिल्म नहीं थी, बल्कि यह उस दौर की सिनेमाई संभावनाओं का भी प्रतीक थी। इसने धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों पर आधारित फिल्मों की लोकप्रियता को बढ़ाने में योगदान दिया। बाद के वर्षों में भारतीय सिनेमा में रामायण और महाभारत सहित कई पौराणिक कथाओं पर फिल्में और धारावाहिक बनाए गए।
वर्ष 1917 में बनी इस फिल्म को आज 109 साल हो चुके हैं। इतने लंबे समय बाद भी ‘लंका दहन’ का उल्लेख भारतीय सिनेमा के शुरुआती इतिहास और दादा साहेब फाल्के के योगदान को याद करने के लिए किया जाता है।
‘लंका दहन’ की ऐतिहासिक अहमियत यही है कि इसने उस दौर में भारतीय दर्शकों के सामने धर्म, साहस और सत्य की विजय की कहानी को एक नए माध्यम से प्रस्तुत किया। यह फिल्म भारतीय सिनेमा की उस यात्रा की याद दिलाती है, जिसकी शुरुआत सीमित संसाधनों से हुई थी और जो आज विश्व स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना चुका है।
