
गाजियाबाद के हरीश राणा का आज दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया। वे पिछले 13 साल से कोमा में थे और हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से उन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति मिली थी। हरीश राणा अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर अस्पताल (आईआरसीएच) में भर्ती थे और उन्हें उपशामक देखभाल वार्ड में रखा गया था।
अस्पताल में पिछले एक सप्ताह से उनकी गहन निगरानी की जा रही थी। डॉक्टरों ने 23 मार्च को बताया था कि उन्हें कुछ और समय निगरानी में रखा जा सकता है। इस दौरान हरीश राणा छह दिनों तक बिना खाना और पानी के रहे। उनके माता-पिता इस दौरान किसी चमत्कार की उम्मीद लगाए हुए थे। सुप्रीम कोर्ट की अनुमति मिलने के बाद ही यह इच्छामृत्यु प्रक्रिया शुरू की गई थी।
हरीश राणा जुलाई 2010 में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के छात्र थे। वर्ष 2013 में अंतिम वर्ष में पढ़ाई के दौरान, अगस्त के महीने में रक्षाबंधन के दिन, बहन से फोन पर बात करते हुए वह पीजीआई चौथी मंजिल से गिर गए। गंभीर चोट लगने के बाद उन्हें तुरंत पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती कराया गया। दिसंबर 2013 में उनकी स्थिति गंभीर होने पर उन्हें दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में स्थानांतरित किया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें क्वाड्रिप्लेजिया (चारों अंगों में लकवा) की बीमारी का पता लगाया।
डॉक्टरों की विशेष टीम ने अंतिम दिनों में उनकी स्थिति पर लगातार नजर रखी। 13 साल लंबे कोमा जीवन के बाद हरीश राणा ने आज अंतिम सांस ली। यह मामला संवेदनशील और जटिल था, जिसने देश में इच्छामृत्यु और जीवन की गुणवत्ता पर नई बहस को जन्म दिया।