“राज कपूर की ‘मेरा नाम जोकर’ बनने में छह साल क्यों लगे? ये थी फिल्म के फ्लॉप होने की असली वजह”

राज कपूर की ‘मेरा नाम जोकर’ भारतीय सिनेमा की एक ऐसी फिल्म है, जिसे न केवल उसकी कलात्मकता के लिए याद किया जाता है, बल्कि इसके निर्माण और रिलीज़ के समय के दौरान भी इसे लेकर कई चर्चाएं हुई थीं। जब यह फिल्म 1970 में रिलीज़ हुई, तो यह बॉक्स ऑफिस पर पूरी तरह से फ्लॉप रही थी। हालांकि, समय के साथ यह फिल्म सिनेमा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर चुकी है। इसकी कहानी, इसका निर्देशन और इसकी शारीरिक संरचना आज भी सिनेमा के कला रूप को लेकर किए गए एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखी जाती है। लेकिन सवाल यह है कि आखिरकार इस फिल्म को बनने में छह साल क्यों लगे, और क्यों यह फिल्म अपनी रिलीज़ के वक्त इतना बड़ा विफलता साबित हुई?

निर्माण में देरी: एक मुश्किल यात्रा

राज कपूर का ‘मेरा नाम जोकर’ बनाने का सपना बहुत पहले से था, लेकिन इस फिल्म को साकार रूप देने के लिए उन्हें काफी समय और मेहनत करनी पड़ी। 1964 में जब राज कपूर ने इस फिल्म की योजना बनानी शुरू की, तो उन्होंने इसे एक एतिहासिक कृति बनाने की ठानी थी। फिल्म का विषय उस समय के भारतीय सिनेमा के सामान्य चलन से बिल्कुल अलग था। यह एक गहरे और गंभीर भावनात्मक कथा पर आधारित थी, जिसमें एक जोकर की कहानी थी, जो अपने निजी जीवन में कई प्रकार के दुख और निराशाओं का सामना करता है।

फिल्म की कहानी की जटिलता और उसके गहरे भावनात्मक पहलू ने ही इसे बनाने में छह साल का समय लिया। राज कपूर के लिए यह फिल्म सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि उनका एक व्यक्तिगत सपना था, जिसे उन्होंने पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। फिल्म के हर हिस्से पर बहुत ध्यान दिया गया था, और इसी कारण निर्माण के दौरान कई समस्याएँ सामने आईं।

कास्टिंग और तकनीकी मुद्दे:

फिल्म की कास्टिंग भी एक बड़ा कारण थी जिसकी वजह से फिल्म के निर्माण में इतना वक्त लगा। राज कपूर ने मुख्य भूमिका के लिए खुद को चुना था और वह एक जोकर के किरदार में पूरी तरह से डूबने के लिए तैयार थे। इसके अलावा, फिल्म में कई महत्वपूर्ण किरदारों के लिए भी उन्हें सही कलाकारों की तलाश थी। इसमें अभिनेत्री सिमि ग्रेवाल, राजेंद्र कुमार, और अन्य प्रमुख कलाकार शामिल थे।

इसके साथ ही, फिल्म में सर्कस के दृश्य और जोकर के रूप में राज कपूर के अभिनय को विश्वसनीय बनाने के लिए विशेष प्रभावों और सेट डिज़ाइन पर भी काफी समय दिया गया। फिल्म की शूटिंग के दौरान लगातार बदलाव होते रहे और तकनीकी कारणों से कई बार शूटिंग स्थगित की गई।

फिल्म की थीम और दर्शकों की अपेक्षाएँ:

‘मेरा नाम जोकर’ की थीम बहुत ही अलग और नए प्रयोगों से भरपूर थी, जो उस समय के दर्शकों के लिए एकदम नई थी। यह फिल्म केवल एक मनोरंजन का साधन नहीं थी, बल्कि यह गहरे भावनात्मक और दार्शनिक पहलुओं को छूने की कोशिश कर रही थी। फिल्म का मुख्य पात्र, जोकर, अपने जीवन में व्यक्तिगत समस्याओं और भावनात्मक संघर्षों का सामना करता है। यह विषय उस समय के भारतीय दर्शकों के लिए बहुत गंभीर था, और लोग ऐसे गंभीर विषयों से दूर भागते थे।

इसके अलावा, फिल्म की लंबाई भी एक महत्वपूर्ण कारण थी। फिल्म की रनटाइम बहुत अधिक थी (करीब 4 घंटे), जो दर्शकों के लिए बहुत अधिक बोझिल साबित हुई। आम तौर पर, उस समय के दर्शकों को छोटी, हल्की-फुल्की और मनोरंजक फिल्में पसंद आती थीं। ‘मेरा नाम जोकर’ में धीमी गति और गहरे भावनात्मक दृश्यों ने दर्शकों को थकान महसूस कराई, और परिणामस्वरूप फिल्म ने बुरी तरह से बॉक्स ऑफिस पर नाकामी का सामना किया।

फिल्म की असफलता और आलोचना:

जब ‘मेरा नाम जोकर’ रिलीज़ हुई, तो इसे आलोचकों से भी मिश्रित प्रतिक्रियाएँ मिलीं। कुछ आलोचकों ने फिल्म की कलात्मकता और राज कपूर के निर्देशन की सराहना की, लेकिन अधिकांश दर्शकों को यह फिल्म बहुत ही बोझिल और नीरस लगी। फिल्म की असफलता के कई कारण थे, जिसमें उसकी लंबाई, थीम और धीमी गति शामिल थी। इसके अलावा, फिल्म के व्यावसायिक पहलू पर भी ध्यान नहीं दिया गया था। राज कपूर ने अपनी कला को प्राथमिकता दी, लेकिन यह उन दर्शकों के लिए कठिन था, जो मनोरंजन और हल्के-फुल्के विषयों की अपेक्षा कर रहे थे।

समय के साथ ‘मेरा नाम जोकर’ का महत्व:

हालांकि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही, लेकिन समय के साथ इसकी काव्यात्मक और कलात्मक गहराई को पहचाना गया। यह एक ऐसी फिल्म बन गई, जिसे सिनेमा के शुद्ध प्रेमियों और कलाकारों के द्वारा सराहा गया। ‘मेरा नाम जोकर’ को अब एक क्लासिक के रूप में देखा जाता है और इसे भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन कृतियों में गिना जाता है। फिल्म के प्रति दर्शकों का दृष्टिकोण समय के साथ बदल गया, और अब इसे एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक फिल्म के रूप में देखा जाता है।राज कपूर की यह फिल्म न केवल भारतीय सिनेमा की धरोहर बन चुकी है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि कभी-कभी बड़ी कृतियाँ अपनी रिलीज़ के समय पर पहचान नहीं पातीं, लेकिन समय के साथ उनकी महत्ता उजागर होती है। ‘मेरा नाम जोकर’ ने यह साबित किया कि कला को कभी भी व्यावसायिक सफलता से नापा नहीं जा सकता।

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