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ग्वालियर के बेटे ने NASA में दिखाया कमाल:प्रतीक का शोध- लैंडिंग साइट से PSR में दो घंटे में लौट सकते हैं अंतरिक्ष यात्री - The Indian Exposure

ग्वालियर के बेटे ने NASA में दिखाया कमाल:प्रतीक का शोध- लैंडिंग साइट से PSR में दो घंटे में लौट सकते हैं अंतरिक्ष यात्री

NASA

ग्वालियर के एक इंजीनियर बेटे ने नासा के चंद्रमा के लिए आयोजित मिशन आर्टेमिस-3 में योगदान देकर शहर के साथ ही देश का नाम रोशन किया है। वह नासा के 10 सप्ताह के सलाना समर इंटर्न प्रोग्राम के लिए 300 स्कॉलर में से न केवल चयनित हुए, बल्कि अपने शोध से सभी को चकित कर दिया। उनके शोध से निष्कर्ष निकला कि लैंडिंग साइट से PSR (परमानेंट शैडो रीजन) पर अंतरिक्ष यात्री दो घंटे में लौट सकते हैं।

ग्वालियर के इस बेटे के परीक्षण में वैज्ञानिकों काफी दिलचस्पी ली है। अभी अगस्त में प्रतीक यह इंटर्न प्रोग्राम पूरा कर अपने इंस्टीट्यूट IIT रूड़की लौटे हैं। यहां ग्वालियर के बहोड़ापुर स्थित जाधव कॉलोनी में उनके पिता, मां व भाई ने उनकी इस तरक्की पर काफी खुशी जाहिर की है। उनका कहना है कि प्रतीक बचपन से ही होनहार हैं।

ग्वालियर का बेटा और IIT रूड़की के सिविल इंजीनियरिंग विभाग क रिसर्च स्कॉलर प्रतीक त्रिपाठी ने नासा के प्रतिष्ठित आर्टेमिस प्रोग्राम में अहम योगदान दिया है। उनका चयन मार्च में चंद्रमा के लिए आयोजित आर्टेमिस मिशन-3 में योगदान के लिए नासा के 10 सप्ताह के सलाना समर इंटर्न प्रोग्राम के लिए हुआ था। इसके तहत उन्होंने मई से अगस्त 2022 तक शोध में निष्कर्ष दिया है कि अंतरिक्ष यात्री लैंडिंग साइट से दो घंटे में एक स्थायी छाया क्षेत्र परमानेंट शैडो रीजन (PSR) तक जाकर लौट सकते हैं।

प्रतीक ने नासा में स्पेन, यूके, डोमिनिका के शोधकर्ताओं के साथ काम किया
ग्वालियर के बहोड़ापुर स्थित जाधव कॉलोनी निवासी रिटायर्ड शिक्षक रवि त्रिपाठी के बेटे प्रतीक त्रिपाठी ने नासा में स्पेन, यूनाइटेड किंगडम और डोमिनिका के शोधकर्ताओं के साथ काम किया। इस दौरान उन्होंने लैंडिंग साइटों से स्थायी छाया क्षेत्रों (PSR) तक आने-जाने की संभावित योजनाओं के मद्देनजर ढलान, तापमान, रोशनी और पैदल चलने में लगे समय जैसे मानकों का आकलन किया। इन PSR में आरंभिक सौर मंडल से अब तक के हाइड्रोजन, हिमजल और अन्य वाष्पशील जीवाश्मांे के रिकॉर्ड होते हैं। प्रतीक के परीक्षण में वैज्ञानिकों ने खास दिलचस्पी ली है और यह नासा के आर्टेमिस-3 मिशन का बुनियादी उद्देश्य बन सकता है। प्रतीक ने लूनर एंड प्लैनेटरी इंस्टीट्यूट (LPI) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ डेविड क्रिंग के मार्गदर्शन में काम किया।

300 में से 5 सिलेक्ट हुए थे जिसमें ग्वालियर का बेटा भी
इस प्रोग्राम का आयोजन लूनर एंड प्लैनेटरी इंस्टीट्यूट (LPI) और नासा के जॉनसन स्पेस सेंटर ह्यूस्टन अमेरिका ने किया था। उन्होंने बताया कि इस बार नासा का समर इंटर्न प्रोग्राम काफी प्रतियोगी था। 300 से ज्याद आवेदन आए थे। इनमें से पांच को चुना गया था जिसमें प्रतीक का चयन हुआ था और उन्होंने अपने देश, IIT रूड़की और ग्वालियर का नाम रोशन किया। उनके शोध को सभी ने सराहा है।


ग्वालियर से इंजीनियरिंग कर नासा के इंटर्न तक का सफर
ग्वालियर के प्रतीक त्रिपाठी, जियोमैटिक्स इंजीनियरिंग ग्रुप के रिसर्च स्कॉलर हैं, जो प्रो. राहुल देव गर्ग के अधीन कार्यरत हैं। उनका शोध पृथ्वी, चंद्रमा और मंगल पर खनिजों की विशेषता और पहचान के लिए हाइपरस्पेक्ट्रल और रमन सहित इमेजिंग और गैर-इमेजिंग स्पेक्ट्रोस्कोपिक डेटासेट के अनुप्रयोग और एकीकरण पर केंद्रित है। प्रतीक त्रिपाठी ने 2016 में ग्वालियर के ITM ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट से इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में 86% मार्क्स के साथ ब्रांच टॉपर के रूप में BE की डिग्री प्राप्त की। बाद में उन्हें अत्यधिक प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के माध्यम से भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान (IIRS) में M.TECH के लिए चुना गया। उन्होंने भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान (IIRS) से सैटेलाइट इमेज एनालिसिस और फोटोग्रामेट्री में विशेषज्ञता के साथ रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना प्रणाली में 2018 में M.TECH की डिग्री प्राप्त की, जो कि देहरादून, भारत में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था (इसरो-ISRO) की एक इकाई है। इसके तुरंत बाद प्रतीक का चयन IIT रुड़की के सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के जियोमैटिक्स इंजीनियरिंग ग्रुप में 2018 में हुआ ।


कई अवार्ड ले चुके हैं प्रतीक
प्रतीक भारत में ढाला और रामगढ़ इम्पैक्ट क्रेटर्स पर उनके काम के लिए 2022 लूनर एंड प्लैनेटरी इंस्टीट्यूट का करियर डेवलपमेंट अवार्ड ले चुके हैं। उन्होंने हाल ही में लूनर एंड प्लैनेटरी इंस्टीट्यूट (LPI) और नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा-NASA) के जॉनसन स्पेस सेंटर, ह्यूस्टन, टेक्सास द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित एक अत्यधिक प्रतिस्पर्धी 10-सप्ताह लंबी इंटर्नशिप पूरी की। 31 मई से 5 अगस्त तक चली इस इंटर्नशिप को यूनिवर्सिटी स्पेस रिसर्च एसोसिएशन (USRA) द्वारा फंडेड किया गया था और केवल पांच छात्रों को स्वीकार गया! इस साल इस प्रतियोगी इंटर्नशिप के लिए 300 से अधिक आवेदन आये एवं उनमे से में से चुने गए केवल पांच फेलोशिप में एक प्रतीक त्रिपाठी को दिया गया जो की जियोमैटिक्स इंजीनियरिंग ग्रुप सिविल इंजीनियरिंग आईआईटी रुड़की के प्रोफेसर राहुल देव गर्ग के मार्गदर्शन में कार्यरत हैं।


बचपन से आसमान में सितारे देखता था प्रतीक
ग्वालियर के बहोड़ापुर स्थित जाधव कॉलोनी में प्रतीक का पूरा परिवार रहता है। उनके पिता रविन्द्र त्रिपाठी (63) और मां ऊषा त्रिपाठी (62) दोनों ही शिक्षा विभाग से रिटायर्ड हैं। वह तीन भाई हैं प्रतीक से एक भाई बड़ा और एक छोटा है। बड़े भाई जॉब के साथ सिविल सर्विसेज की तैयार कर रहे हैं तो छोटा भाई बैंक में असिस्टेंट मैनेजर है। प्रतीक के पिता रविन्द्र ने दैनिक भास्कर को बताया कि प्रतीक बचपन से ही होनहार था। उनके पास एक पुरानी दूरबीन थी। उसे लेकर छत पर चंद्रमा और तारे देखता था। उस समय भी उसकी इच्छा तारे, चंद्रमा और अंतरिक्ष को जानने की होती थी। व्यस्तता के चलते मैं उसे समय नहीं दे पाया, लेकिन प्रतीक की मां ने हमेशा उसे सपोर्ट किया और उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

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