
अंकिता हत्याकांड की जांच समय से रेगुलर पुलिस को सौंप दी गई तो अपराधी सलाखों के पीछे पहुंच गए। वरना, उत्तराखंड की पटवारी पुलिस व्यवस्था में बहुत से लोग ऐसे हैं, जिनके अपनों की हत्या हुई और हत्यारे आज तक पकड़ में नहीं आ सके। राजस्व पुलिस की लचर जांच के चलते तीन साल में 16 में से 13 मुकदमों में रेगुलर पुलिस को भी अंतिम रिपोर्ट लगानी पड़ी।
राजस्व पुलिस के पास रेगुलर पुलिस की तरह संसाधन नहीं होते हैं। न तो साक्ष्य इकट्ठा करने की प्रभावी व्यवस्था होती है और न ही इतना बड़ा मुखबिर तंत्र। आधुनिक वैज्ञानिक साक्ष्यों को जुटाने के तरीके भी राजस्व पुलिस के पास नहीं हैं। ऐसे में ज्यादातर जघन्य अपराधों की जांच कुछ दिनों बाद रेगुलर पुलिस को ही सौंप दी जाती है। मगर, तब तक इतनी देर हो जाती है कि इसमें रेगुलर पुलिस के पास भी करने के लिए कुछ नहीं बचता।
अधिकतर साक्ष्य मिट जाते हैं। अपराधी भाग जाते हैं। अंत में पुलिस के पास भी इन मुकदमों में अंतिम रिपोर्ट लगाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। तीन साल के आंकड़ों के अनुसार, राजस्व क्षेत्र में हुईं 16 हत्याओं का पटवारी खुलासा नहीं कर पाए तो इन्हें रेगुलर पुलिस को ट्रांसफर कर दिया गया। कई महीनों तक जांच हुई मगर नतीजा सिफर ही रहा। पुलिस को 13 मुकदमों में सुबूतों के अभाव में अंतिम रिपोर्ट लगानी पड़ी। तीन मुकदमों की तफ्तीश जारी है।