
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ऋषिकेश में मानवता की मिसाल पेश करते हुए एक परिवार ने ऐसा निर्णय लिया, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया। मात्र आठ दिन की नवजात बच्ची के निधन के बाद उसके माता-पिता ने गहरे दुख के बावजूद उसका शरीर चिकित्सा शिक्षा के लिए दान कर दिया। उनका मानना है कि उनकी बेटी भले ही इस दुनिया में अधिक समय न रह सकी, लेकिन उसका देहदान भविष्य के डॉक्टरों की शिक्षा में सहायक बनकर किसी और की जिंदगी बचाने में योगदान दे सकता है।
नवजात की मृत्यु से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। इसी दौरान एम्स के नर्सिंग स्टाफ ने परिजनों को मोहन फाउंडेशन, उत्तराखंड के प्रोजेक्ट लीडर संचित अरोड़ा से संपर्क करवाया। अरोड़ा ने नेत्रदान कार्यकर्ता एवं लायंस क्लब ऋषिकेश देवभूमि के चार्टर अध्यक्ष गोपाल नारंग के साथ एम्स पहुंचकर परिजनों को देहदान के महत्व के बारे में जानकारी दी।
परिजनों की सहमति मिलने के बाद संचित अरोड़ा ने एम्स ऋषिकेश के एनाटॉमी विभाग से संपर्क कर सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कीं और मृत नवजात की देह विभाग को सौंप दी गई। उल्लेखनीय है कि अरोड़ा इससे पहले भी दो देहदान की प्रक्रिया पूरी करवा चुके हैं।
एम्स के पीआरओ डॉ. श्रीलॉय मोहंती ने बताया कि उपचार के दौरान आठ दिन की नवजात की मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद परिजनों ने स्वेच्छा से देहदान का निर्णय लिया। नवजात के पिता संदीप राम ने कहा कि उनकी बेटी जन्म से ही आंतों की गंभीर बीमारी से पीड़ित थी। तमाम चिकित्सकीय प्रयासों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका। उन्होंने कहा कि यह उनके जीवन का सबसे बड़ा दुख है, लेकिन देहदान का निर्णय इस सोच के साथ लिया गया कि उनकी बेटी का शरीर किसी और बच्चे के जीवन के लिए आशा बन सके।